तुम हर बार
सच को भी
सत्यापित करते हो
मेरे सत्य पर और
मैं ये सोचकर कि
तुम्हारी आदत हैं
मेरी हर बात पर
बात को नहीं
खुद को मुझ पर
स्थापित करने की
और मैं ये जानती हूँ
इसलिए उसे वही
अलापविराम दे
देती हूँ क्योंकि
मुझे पता है तुम्हारा
सच मेरे सामने
और चार जुड़े लोगो
के सामने हमेशा
अलग होता है
सच तुम्हारा सच
कितना अलग हैं
मेरे सच से ।