कितना कुछ हैं दबा हुआ सा ..
जो कभी खुला ही नहीं ...
बहुत दिनों से बंद हैं वो भीतर ..
कागजो में ही कही सिमटा हुआ सा ..
जिसे पढ़ा ही नहीं ..
पढ़कर उसे क्या मिलेगा ..
कुछ सवाल जो जहन में होंगे ..
कि लिखा ग़या वो मेरे ही द्वारा ..
पर क्यों लिखा ग़या ये पता नहीं ..
उन गहरे पन्नो पर स्याही
चिपक गयी हो जेसे ...
पर आज फिर से मैं
खोल रही हूँ वो पन्ने
इसलिए नहीं कि वो मुझसे जुड़े नहीं ..
इसलिए क्योंकि मैं उनको पढ़कर ..
खुद को समझना चाहती हूँ ..
कितना आगे निकल आई
ये जानना चाहती हूँ ..
और इसी वजह से वो पन्ने
फिर से खुल चुके हैं ...
और मेरी हर निगाह का इन्तजार
करते वो शब्द ..
वही उसी जगह लिखे हुए हैं
जहां काफी समय पहले लिखे हुए थे..