जाने कहा गुम हूँ मैं ..
लिखती थी ..महसूस करती थी
..
सब कुछ जो घट रहा हैं मेरे
आस पास ..
हर एक बात जो मेरे मन पर
आकर
चोट कर देती थी और बना देती
थी
मुझे किसी का भी रूप और
उस रूप में खुद को पाकर मैं
अपने
मन को उसका बना लेती
थी
और लिख डालती थी वो सब जो
वो महसूस कर रहा हैं हर पल
वह आदमी जो आज भी मेरे
आस पास ही हैं और उसकी रोज
की जिंदगी जी रहा हैं लकिन
क्यों आज मैं अनायास ही
नही लिख पा रही कुछ
कुछ तो हैं जहा मैं गुम हूँ
मुझे खुद मैं गुम नहीं होना
मुझे लिखना हैं हर उस आदमी
पर ,उसके मन में चल रहे आक्रोश
को फिर से ,मुझे गुम नहीं
होना मुझ में
जो छीन लेता हैं मुझ से मुझी
को
और फिर मैं नहीं लिख पाती
मेरे
चारो तरफ का शोर क्योंकि
मेरे शोर में ही सिमट जाता
हैं
सारा शोर और मैं नहीं सुन
पाती
चारो तरफ फेली आवाजे
मुझे गुम नहीं होना खुद मैं
मुझे गुम नहीं होना खुद मैं
!