कितने झूठ हैं और
कितने झूठो पर टिका
रखे हैं हमने रिश्ते
हर रिश्ता जो बस एक
झूठ पर टिका
और वो झूठ हर
रिश्ते का अलग
अलग सा ,न उसका सच हैं
न रिश्ते का सच हैं
फिर भी हर झूठ का
सच पर हर बार का
गढ़ा अस्तितत्व हैं
और उस अस्तित्व पर
टिके हैं न जाने
कितने रिश्ते और
उन रिश्तो को निभाने
के लिए हम फिर
एक झूठ को
सच का आवरण
बना कर फिर बना देते हैं
कभी न ख़तम होने वाला
वही सत्य ,जो जोड़ देता हैं
फिर से दो रिश्तो को
जो जिंदगी के साथ
चलते हैं उम्र भर
और उस झूठ में कई
जिन्दगिया जाती हैं निकल
बस रह जाता हैं तो वो झूठ
और बस वही रिश्ता ....