Wednesday, November 30, 2016

****जिंदगी और ठहराव****

जब तुम थे जब भी बही थी ...

तुम नहीं थे तब भी बही थी..

जिंदगी कभी रुकी ही नहीं..

पर अब जिंदगी फिर से रुकना चाहती हैं..

ठ हरी हैं... शांत हैं...

पर मुझे डर हैं इसी शान्ति से..

ठहरने से...

मैं ठहरती नहीं...

बहती हूँ...

ठहराव कभी देखा नहीं..

सोचा नहीं...

सोच रही हूँ..

बह जायूँ या ठ ...हर जायूँ..

ठहर गयी तो सब थम जाएगा ..

रुक जाएगा ...

पर अब कुछ वक्त ठहरना चाहती हूँ...

अब थक चुकी हूँ..

बहते हुए...

क्योंकि बहुत कुछ बहा हैं

हर बार मेरे साथ...

मेरे बहने के साथ...

पर अब ठहर कर

सबको समेटना चाहती हूँ..

उसे भी जो बहा था कभी ...

और उसे भी जो

बहेगा कभी ...

तुम्हारी ही तुम्हारी
बहती ..मैं

:)

Saturday, November 19, 2016

***गुमनामीयो का शहर***

सुनो तुम...

इतनी तव्वजो मत दो हमें ..

गुमनामियों के शहर में

पाये जाते हैं...

हसते, बिखरते,रोते, गाते

बस वही रहबसर होते हैं ..

इतना पास न आना कि

खुद से दूरी बन जाए ..

हम अक्सर लोगो से दूर

खुद के करीब रहा करते हैं...

वक्त बहेगा तो समझ जाओगे

इन्ही गुमनामियों से

एक शहर हमने भी बनाया हैं ..

जहाँ कुछ वक्त हम

सबसे दूर खुद के साथ

बिता जाया करते हैं ...