Tuesday, June 23, 2015

**********एक लड़की और एक चिड़िया *********


वो गगन में उड़ने वाली लड़की 
दुनिया देखनी हैं उसे...
बंधकर नहीं रहना था ....
पर तुमने ये कभी समझा ही नही ...
और बाँध दिया उसे ....
वो बंधना नहीं चाहती ....
एक पंछी की तरह हैं ...
जो आकाश में उड़ना पसंद करते हैं....
जब चाहो जिस डाल पर बेठो ..
र जब चाहो उड़ जायो ....
तुम उसे आकाश दो ...
उसके साथ उड़ो....
उसकी कल्पनाये ..
जो बहुत ही ज्यादा हैं...
और तुम्हारी सोच से भी परे हैं....
उन्हें पंख दो....
क्योंकि तुम जितना उसको पंख दोगे....
आजाद करोगे ...वो उतना तुम्हारे आस पास खुद को पायेगी ......
पर काश तुमने ये समझा होता ...
तुम्हे तो हर पंछी को केद करना हैं ...अपने पिजरे में....
वो पिजरा सोने का भी हो...
पर पिंजरा हैं उसके लिए ....
वो सिर्फ उड़ना जानती हैं ...
चहचहाना जानती हैं....
उसे आकाश चाहीये ...
तुम्हारी बाहे आकाश की तरह होनी चाहीये....
और उसमें बहुत सारी जगह ....
जिससे वो जब चाहे उड़ जाए ....
मुठठी में केद नहीं कर पायोगे उसे.....
इसलिए उम्मीद भी छोड़ दो.....
वो सिर्फ आजाद रहना जानती हैं....
उसके अपार आकाश मैं ...
अपनी ढेरो कल्पनायो के साथ....
तुम्हारे साथ रहने की उनमें से सिर्फ एक कल्पना हैं....
उसकी जिंदगी नही ....इसलिए ...
उन अपार कल्पनायो को सजोये रखना ही उसकी जिंदगी हैं ...
और तुम एक सूखे पत्ते या तिनके की तरह हो ....
जो मजबूत हुआ तो उसके घर बनाने में काम आ जाएगा ...
और जिंदगी भर वो घर सजोकर रखेगी ...
पर अगर मजबूत न हुआ ..
तो वो कभी भी उसकी चोंच से गिर जाएगा ....
और वो नए तिनके की तलाश मैं फिर से चल देगी ......
क्योंकि उसका घर एक-एक मजबूत तिनके से बना हैं ...
.जिसमें वो शाम ढले आना पसंद करती हैं .....:)
 
 

Monday, April 27, 2015

*****पानी और आसमाँ ******

जहाँ दूर पानी
 से आसमाँ 
मिल रहा था ....
बस वही एक
जगह मुझे
बहुत पसंद हैं .....
जिस तरह वह
पानी और आसमाँ
अलग अलग
होते हुए भी एक
दिखाई देते हैं ....
बस वही मुझे
तुम और मैं
खड़े दीखाई
देते हैं ....
न पानी डूबा
पाता आसमाँ को ..
और न आसमाँ
समेट पाता
पानी को..
पर दोनों
निरंतर साथ हैं .
हमेशा
एक दुसरे के लिए..
उसी तरह
जेसे तुम और मैं
साथ हैं
एक दुसरे
के लिए .........

 

Saturday, April 4, 2015

तुमसे दुरी ...और मैं.....

मैं नहीं चाहती ..
 तुमसे दूर जाना ...
पर सोचती हूँ ..
मेरे दूर जाने से शायद ..
तुम्हारी जिंदगी ज्यादा
सुलझ जायेगी ...
और  सोच पाओगे
वो सब जो मेरे रहने से
तुम नहीं सोच सकते ...
इसलिए मुझे जाना होगा ..
दूर ..
बहुत दूर ..
मुझे पता हैं मैं गलत हूँ
पर हर गलत ..
गलत नहीं होता ..
सही भी होता हैं...
और उस सही के लिए
हर बार जाना होता हैं..
दूर ...
अपनों से ...
कि जो अपना हैं
फिर से वो समझ सके ..
दूर होने का सबब...
जिंदगी आसान नहीं हैं ...
पर इसे इतना उलझायो मत ..
सुलझ जाने दो ...
शायद मेरे जाने से
सुलझ जाए जो तुम
नहीं सुलझा पाए ...
हाँ प्रेम मुझे बहुत हैं
तुमसे ...
पर हर प्रेम का
मतलब पाना नहीं होता ..
खोना भी होता हैं ...
इसलिए बस अब
कोई सवाल नहीं ...
क्योंकि जवाब
नहीं हैं अब मेरे पास ...
बस ये समझना
कि हर जवाब में
तुम्हारे लिए प्रेम
ही हैं ...
वो भी अधाह..
और शायद तुम भी
समझ पाते
उस प्रेम को ..
जिसे मैंने समझा ......
 

Thursday, April 2, 2015

सागर किनारा ...वो शाम ....तुम और मैं......

तुम्हारे साथ
बीती वो शाम ...
याद हैं मुझे ..
वो सागर किनारा
बस तुम और मैं....
दूर तक कोई नहीं था ...
उस रेत में दोनों ने
सपने देखे थे ...
तुम्हे .. वो गगन चुम्बी इमारत
दीखाई दी ,जिसमें रहने का
सपना तुम्हारा था ....
और मुझे वो एक सागर किनारा ..
जहाँ छोटा सा घर ही
मेरा सपना था....
दोनों के सपने अलग थे ..
तुम्हे उचाई पर पहुँचना था ..
और मुझे वो सागर की गहराई
सुखुद लगी ...
बस यही अंतर था ..
तुम में और मुझ मैं....
फिर तुम अपने रास्ते
 चल दिए ..
और मैं .....
अपनी मंजिल कि और ...
पर ....
हाँ वो पल बेहद खूबसूरत था
और वो शाम भी ..वो लहरे ..
वो रेत ..और दूर तक
 एक सन्नाटे में  शोर जो
 सिर्फ पानी का था ...
उस शोर में तुमने और मैंने
अपने अपने सुख दुःख सब गढ़े थे ..
हाँ तुम मुझे अच्छे लगे थे ...
पर उससे भी ज्यादा था
 वो खूबसूरत पल...
जहाँ मुझे खुद के होने का अहसास
तुमसे ज्यादा था ....और आज भी
वो अहसास मेरे साथ हैं ...
तुमसे ज्यादा ...खुद के होने का ..
इसलिए ...मुझे पल को सहेजने की
आदत हैं ....क्योंकि मुझे पता हैं ..
पल ही हैं
 जो खूबसूरत होते हैं ...

 

Tuesday, February 3, 2015

*******कुछ पुराने शब्द और पन्ने *********



कितना कुछ हैं दबा हुआ सा ..

जो कभी खुला ही नहीं ...

बहुत दिनों से बंद हैं वो भीतर ..

कागजो में ही कही सिमटा हुआ सा ..

जिसे पढ़ा ही नहीं ..

पढ़कर उसे क्या मिलेगा ..

कुछ सवाल जो जहन में होंगे ..

कि लिखा ग़या वो मेरे ही द्वारा ..

पर क्यों लिखा ग़या ये पता नहीं ..

उन गहरे पन्नो पर स्याही

चिपक गयी हो जेसे ...

पर आज फिर से मैं

खोल रही हूँ वो पन्ने

इसलिए नहीं कि वो मुझसे जुड़े नहीं ..

इसलिए क्योंकि मैं उनको पढ़कर ..

खुद को समझना चाहती हूँ ..

कितना आगे निकल आई

ये जानना चाहती हूँ ..

और इसी वजह से वो पन्ने

फिर से खुल चुके हैं ...

और मेरी हर निगाह का इन्तजार

 करते वो शब्द ..

वही उसी जगह लिखे हुए हैं

जहां काफी समय पहले लिखे हुए थे..