जहाँ सब अपना अपना बीच में जगह ढूढ़ते दीखाई देते थे...
वहां मैं अपना एक सुकून सा कोना ढूढती थी....भीड़ मुझे कभी अच्छी नही लगी....जब सबको बाहर जाना होता था...मुझे अकेले रहना होता था...खुद के साथ...भीड़ से जुदा...सारी दुनिया से जुदा....मुझे खुद को सबसे आगे रखना कभी अच्छा नही लगा....बस एक कोना ...जो सबसे प्यारा होता था....उस अकेलेपन मैं मैंने खुद को जाना हैं ..कई बार ...खुद को समेटा हैं गिरते हुए...हर बार ...हर उस परेशानी से बाहर निकाला हैं खुद को ...खुद के साथ....महसूस किया हैं ....अकेलापन मेरा सबसे बड़ा साथी रहा हैं....शायद उस अकेलेपन ने ही मुझे हिम्मत दी हैं....आगे चलने की ..बढ़ने की....टूट कर बिखर कर ...आगे जीने की....जिंदगी रुकी नही ...चलती गयी ....कई बार लिखते रहने की आदत मेरी साथी बन चुकी हैं ...मैंने उतारा हैं पन्नो पर हर वो सच जो मुझसे जुडा था....पन्ने मेरे थे....सच मेरा था....बस किरदार बदलते गये....हर बार बिखर कर खुद को सजोया हैं मैंने उन्ही कोनो मैं ....और हर जिंदगी के दुख मैं खुद दुखी हो जाती हूँ...दिल से जीती हूँ....जिंदगी मैं जो जब अछा लगा किया...जो नहीं लगा छोड़ दिया....आगे बढना सीखा हैं मैंने खुद के साथ....रोते -गाते -हस्ते -मुस्कराते सिर्फ खुद को रुकने नहीं दिया ....धुप छाव गर्मी बारिश सर्दी ....सभी को खुद को खुद के साथ पाया हैं इन कोनो मैं ....खुद को खुद के साथ जिया हैं इन कोनो मैं ....
हर बार ये अकेलापन ,एकाकीपन मुझे मजबूत करता हैं...खुद के लिए जीने को...दूसरो के लिए कन्धा बनने को.....इन कोनो का सच मुझे पता हैं.....मेरी मुस्कराहटो का सच मुझे पता हैं...जिंदगी जीने का सच मुझे पता हैं.....बस इन्ही कोनो को मेरा सच पता हैं...मेरा वो रूप बता हैं ..जो दुनिया को नहीं पता हैं....और अब ये कोने मुझसे जुड़ चुके हैं ...अब ये कोने ही रहना चाहते हैं...अब इन कोनो की जगह कोई नहीं ले सकता ....क्योंकि मुझे इनकी ज्यादा जरुरत हैं....आगे बढ़ने के लिए....मुस्कराने के लिए...फिर से खुद को खोकर पाने के लिए....मेरे आत्मचिन्तन के लिए.....
वहां मैं अपना एक सुकून सा कोना ढूढती थी....भीड़ मुझे कभी अच्छी नही लगी....जब सबको बाहर जाना होता था...मुझे अकेले रहना होता था...खुद के साथ...भीड़ से जुदा...सारी दुनिया से जुदा....मुझे खुद को सबसे आगे रखना कभी अच्छा नही लगा....बस एक कोना ...जो सबसे प्यारा होता था....उस अकेलेपन मैं मैंने खुद को जाना हैं ..कई बार ...खुद को समेटा हैं गिरते हुए...हर बार ...हर उस परेशानी से बाहर निकाला हैं खुद को ...खुद के साथ....महसूस किया हैं ....अकेलापन मेरा सबसे बड़ा साथी रहा हैं....शायद उस अकेलेपन ने ही मुझे हिम्मत दी हैं....आगे चलने की ..बढ़ने की....टूट कर बिखर कर ...आगे जीने की....जिंदगी रुकी नही ...चलती गयी ....कई बार लिखते रहने की आदत मेरी साथी बन चुकी हैं ...मैंने उतारा हैं पन्नो पर हर वो सच जो मुझसे जुडा था....पन्ने मेरे थे....सच मेरा था....बस किरदार बदलते गये....हर बार बिखर कर खुद को सजोया हैं मैंने उन्ही कोनो मैं ....और हर जिंदगी के दुख मैं खुद दुखी हो जाती हूँ...दिल से जीती हूँ....जिंदगी मैं जो जब अछा लगा किया...जो नहीं लगा छोड़ दिया....आगे बढना सीखा हैं मैंने खुद के साथ....रोते -गाते -हस्ते -मुस्कराते सिर्फ खुद को रुकने नहीं दिया ....धुप छाव गर्मी बारिश सर्दी ....सभी को खुद को खुद के साथ पाया हैं इन कोनो मैं ....खुद को खुद के साथ जिया हैं इन कोनो मैं ....
हर बार ये अकेलापन ,एकाकीपन मुझे मजबूत करता हैं...खुद के लिए जीने को...दूसरो के लिए कन्धा बनने को.....इन कोनो का सच मुझे पता हैं.....मेरी मुस्कराहटो का सच मुझे पता हैं...जिंदगी जीने का सच मुझे पता हैं.....बस इन्ही कोनो को मेरा सच पता हैं...मेरा वो रूप बता हैं ..जो दुनिया को नहीं पता हैं....और अब ये कोने मुझसे जुड़ चुके हैं ...अब ये कोने ही रहना चाहते हैं...अब इन कोनो की जगह कोई नहीं ले सकता ....क्योंकि मुझे इनकी ज्यादा जरुरत हैं....आगे बढ़ने के लिए....मुस्कराने के लिए...फिर से खुद को खोकर पाने के लिए....मेरे आत्मचिन्तन के लिए.....
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