जब मुझे कहना था ..रुक जायो
मत जायो ..
मैंने कहा चले जाऊ ...
जब कहना चाहा प्यार करता हूँ..
तब कहाँ नहीं करता
हूँ..
जब खुल के रोना चाहता था..
पर मुस्कुरा रहा था...मानो कुछ हुआ ही नहीं हो..
जब दोस्त ने पूछा केसे हो..मैंने
कहाँ अछा हूँ ..बस थका हूँ..
पर सच सबसे छिपा लिया...कि
कमजोर हूँ ..रोना चाहता हूँ..
टूटा हूँ अन्दर से...बहुत ज्यादा ...पर बस यही कह नही पाया ..किसी से
..
खुद से भी नही ...क्योंकि रोना
मुझे आता ही नही था...
न ज्यादा समझ पाया खुद को...और न पास आने दिया किसी को..
क्योंकि डरता था...खुद से ..अपने
आप से...काश कोई मुझसे मुझे न चुरा
ले..
मैं खुद को खोना नही चाहता था...इसलिए सब सहता ग़या...बस कुछ नहीं कहा
..
जब भी नही जब मैं अन्दर से टूट रहा था..पूरा टूट चूका था.....जो चाहता
था...उसके विपरीत ही किया ..
हाँ ऐसा ही था मैं ..पर किसी ने समझा ही नहीं ...किसी ने सभाला ही नही ..
कमजोर टूटता सा ...हर बार बिखरने से पहले बह जाता ..क्योंकि मुझे खुद से डर लगता हैं..
कोई मिला ही नहीं जिसने डर
निकाला हो...कहा हो...मैं हूँ साथ तुम्हारे ...हमेशा ..
बस चलते रहो...हाँ मैं हूँ हमेशा तुम्हारे साथ....
बस वही हाथ खोजता रहा
..जिंदगी भर...पर खुद से एक कदम आगे नहीं रखा...
और खोजता रहा जिंदगी भर वो हाथ ......
J
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