Wednesday, September 25, 2013

****मन और रंग ****

ये मन तू रंगों की तरह ही तो है

बदलते हुए रंगों में ढूंढता और

तलाशता हुआ किसी को

एक छोर से दुसरे तक

बस देखता अपनी आँखों से

और समा लेता सभी रंगों

को अपने आप में

कुछ वक्त ,दिन और साल

इन रंगों में बदलते जाते

और फिर शुन्य हो जाता

तू भी मिलकर इनके साथ

फिर शून्य से आगे बढ़कर

बदल देता तस्वीर को

और एक रंग में मिलकर

बदल जाते तेरे रंग भी

ये मन सच तू ही तो है

इन रंगों जेसा और

बदलता रहता ,कब

रह पाता एक जेसा

कही भी ,कभी भी ।

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