शर्मिंदगी तो कभी थी ही नहीं
हम अन्दर से एक लाश बने रहे
अपने कर्मो पर जताते रहे ,ओढ़ते रहे
एक कवच और छुपाते रहे
अपने गुनाह, करतूतों को
और जिस पर पहना दिया एक
कफ़न संसकृति का और
फिर बदल दिया एक झूठ
एक सच में जो कभी
सच था ही नहीं और
आज तक हम नहीं
होते शर्मिंदा उस पर
क्योंकि वह झूठ कभी
झूठ लगा ही नहीं
अब तू भी शर्मिंदा होना
छोड़ दे क्योंकि यहाँ
अब कोई बंदा बचा
ही नहीं जो फेक सके
उन लिवाजो ,पराम्परायो कों
जिसे तेरे जेसो ने बहुत पहले
बनाया था झूठ का सच
जो अभी तक मिटा ही नहीं
चल दोस्त जी ले अपनी
दुनिया अपने हिसाब से
क्योंकि इस जहाँ में तेरे
जेसा और कोई बना ही नहीं ।
हम अन्दर से एक लाश बने रहे
अपने कर्मो पर जताते रहे ,ओढ़ते रहे
एक कवच और छुपाते रहे
अपने गुनाह, करतूतों को
और जिस पर पहना दिया एक
कफ़न संसकृति का और
फिर बदल दिया एक झूठ
एक सच में जो कभी
सच था ही नहीं और
आज तक हम नहीं
होते शर्मिंदा उस पर
क्योंकि वह झूठ कभी
झूठ लगा ही नहीं
अब तू भी शर्मिंदा होना
छोड़ दे क्योंकि यहाँ
अब कोई बंदा बचा
ही नहीं जो फेक सके
उन लिवाजो ,पराम्परायो कों
जिसे तेरे जेसो ने बहुत पहले
बनाया था झूठ का सच
जो अभी तक मिटा ही नहीं
चल दोस्त जी ले अपनी
दुनिया अपने हिसाब से
क्योंकि इस जहाँ में तेरे
जेसा और कोई बना ही नहीं ।
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