Thursday, April 2, 2015

सागर किनारा ...वो शाम ....तुम और मैं......

तुम्हारे साथ
बीती वो शाम ...
याद हैं मुझे ..
वो सागर किनारा
बस तुम और मैं....
दूर तक कोई नहीं था ...
उस रेत में दोनों ने
सपने देखे थे ...
तुम्हे .. वो गगन चुम्बी इमारत
दीखाई दी ,जिसमें रहने का
सपना तुम्हारा था ....
और मुझे वो एक सागर किनारा ..
जहाँ छोटा सा घर ही
मेरा सपना था....
दोनों के सपने अलग थे ..
तुम्हे उचाई पर पहुँचना था ..
और मुझे वो सागर की गहराई
सुखुद लगी ...
बस यही अंतर था ..
तुम में और मुझ मैं....
फिर तुम अपने रास्ते
 चल दिए ..
और मैं .....
अपनी मंजिल कि और ...
पर ....
हाँ वो पल बेहद खूबसूरत था
और वो शाम भी ..वो लहरे ..
वो रेत ..और दूर तक
 एक सन्नाटे में  शोर जो
 सिर्फ पानी का था ...
उस शोर में तुमने और मैंने
अपने अपने सुख दुःख सब गढ़े थे ..
हाँ तुम मुझे अच्छे लगे थे ...
पर उससे भी ज्यादा था
 वो खूबसूरत पल...
जहाँ मुझे खुद के होने का अहसास
तुमसे ज्यादा था ....और आज भी
वो अहसास मेरे साथ हैं ...
तुमसे ज्यादा ...खुद के होने का ..
इसलिए ...मुझे पल को सहेजने की
आदत हैं ....क्योंकि मुझे पता हैं ..
पल ही हैं
 जो खूबसूरत होते हैं ...

 

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