*****शादी और एक औरत*****
शादी एक ऐसा स्वामित्व है एक औरत के लिए
जों बाँध देता है उसे सिर्फ एक ही रिश्ते मे
और वह नही रोक पाती अपने आपको ये
बताने से भी कि अभी अभी शादी हुई हे मेरी
कई बार बस उसमे ही खों जाती है वो
बस रम जाती ही अपने पति और उसके
नए जीवन मे,वही अछा सा काल प्रतीत होता उसे
इस काल मे वो भुलती है सारे रिश्ते नाते
बस एक ही जाल नजर आता है उसे
करती रहती निर्वाह जीवन बस अर्धगानिं बनकर
भूलती रही अपने से किये कुछ वादे
जिसे वास्तव मे वो करना चाहती थी
सब कुछ किसी और के लिये गवा दिया उसने
जब भी किसी से मिला करती वो चूड़ी से भरे हाथ
माँग का सिन्दूर ओर उसकी आँखों से झलकता प्यार
हर बार उसके नयेपन का आभास करा जाता
बस वही कुछ नए दिन और वो खो गई
उन रस्मों रिवाजों ओर समाज के जंजाल मे
जहाँ के लिए वो कभी बनी थी ही नही
और हो गई किसी की परिनीता
हमेशा हमेशा के लिए.....
शादी एक ऐसा स्वामित्व है एक औरत के लिए
जों बाँध देता है उसे सिर्फ एक ही रिश्ते मे
और वह नही रोक पाती अपने आपको ये
बताने से भी कि अभी अभी शादी हुई हे मेरी
कई बार बस उसमे ही खों जाती है वो
बस रम जाती ही अपने पति और उसके
नए जीवन मे,वही अछा सा काल प्रतीत होता उसे
इस काल मे वो भुलती है सारे रिश्ते नाते
बस एक ही जाल नजर आता है उसे
करती रहती निर्वाह जीवन बस अर्धगानिं बनकर
भूलती रही अपने से किये कुछ वादे
जिसे वास्तव मे वो करना चाहती थी
सब कुछ किसी और के लिये गवा दिया उसने
जब भी किसी से मिला करती वो चूड़ी से भरे हाथ
माँग का सिन्दूर ओर उसकी आँखों से झलकता प्यार
हर बार उसके नयेपन का आभास करा जाता
बस वही कुछ नए दिन और वो खो गई
उन रस्मों रिवाजों ओर समाज के जंजाल मे
जहाँ के लिए वो कभी बनी थी ही नही
और हो गई किसी की परिनीता
हमेशा हमेशा के लिए.....
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