Monday, August 5, 2013

*******मेरे शब्द और रंग *******

*******मेरे शब्द और रंग *******
 अभी नही आता मुझे
शब्दों को रंगों में ढालना
अभी तो मुझे अपने
इन्ही काले शब्दों से प्रेम है
मुझे उनको संजोना नही आता
सीखाया था तुमने कयी बार
और कहा था की चाँदनी अधूरी
है चाँद के बिना
पर मुझे वो काला आसमान और
उसमे सिर्फ सफ़ेद चाँद ही नजर आया
इन दो रंगों से मुझे बस बहेद प्यार है
सफ़ेद और उस पर उभरता काला रंग
मैं नही समझ पायी रंगों को
और नही ढाल पायी रंग उसमे
जेसे तुमने कहे थे मुझे
मुझे बस ऐसे ही अछे लगते है
ये शब्द
जो समेट लेते है मुझे हर बार
अपना बना कर
कोई रंग नही इनका
जो मे इनकी रंगत में खो जाऊ
बस मुझे ऐसे ही शब्द चाहीये
मेरी जिंदगीमें
मेरी जिंदगी की तरह .........

2 comments:

  1. शब्दों का मरहम लगाऊ कैसे
    आखिर... शब्द भी तो हो गएँ हैं
    कठोर.. जैसे हम तुम सब

    ReplyDelete